मेटा द्वारा पेश किया गया नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित इमेज जनरेशन फीचर ‘म्यूज इमेज’ अब भारत सरकार की निगरानी में आ गया है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस फीचर की मौजूदा आईटी कानूनों और डिजिटल नियमों के अनुरूप विस्तृत समीक्षा की जाएगी। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नई तकनीक का उपयोग लोगों की सुरक्षा, निजता और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन किए बिना किया जाए।
केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का कहना है कि किसी भी नई एआई तकनीक का मूल्यांकन केवल उसके तकनीकी पहलुओं के आधार पर नहीं किया जाएगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। यदि किसी फीचर के जरिए फर्जी सामग्री तैयार करने, लोगों को गुमराह करने या किसी की पहचान का दुरुपयोग करने की आशंका सामने आती है, तो सरकार आवश्यक कदम उठा सकती है।
आईटी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि सरकार को इस फीचर से जुड़े जो भी सुझाव, शिकायतें और तकनीकी जानकारियां प्राप्त होंगी, उनका विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि मेटा का यह नया एआई टूल भारत के मौजूदा कानूनी ढांचे और डिजिटल नियमों के अनुरूप है या नहीं। यदि किसी प्रकार की कमी या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो आवश्यक कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई इमेज जनरेशन तकनीक जहां रचनात्मक कार्यों को आसान बना सकती है, वहीं इसके गलत इस्तेमाल की संभावनाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिना अनुमति किसी व्यक्ति की तस्वीरों का उपयोग कर नई तस्वीरें तैयार करना, किसी की पहचान बदलकर फर्जी सामग्री बनाना या भ्रामक दृश्य तैयार करना गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
डीपफेक तकनीक पहले ही दुनिया भर में बड़ी चुनौती बन चुकी है। ऐसे में यदि अत्याधुनिक एआई इमेज टूल्स का दुरुपयोग होता है, तो इससे गलत सूचना फैलाने, साइबर अपराध बढ़ने और लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में वृद्धि हो सकती है। यही कारण है कि सरकार इस तकनीक की बारीकी से जांच करना चाहती है।
कंटेंट क्रिएटर्स, कलाकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और फोटोग्राफर्स के लिए भी यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन पेशों में व्यक्ति की पहचान, चेहरा और मौलिक कंटेंट ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति होते हैं। यदि एआई के माध्यम से उनकी अनुमति के बिना उनकी तस्वीरों या शैली का उपयोग किया जाता है, तो इससे कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े नए विवाद पैदा हो सकते हैं।
डिजिटल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि एआई तकनीक के तेजी से विस्तार के साथ मजबूत नियामक व्यवस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। नई तकनीकों को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है, लेकिन उनके उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इससे नवाचार और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखा जा सकेगा।
सरकार की समीक्षा के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाएगा कि म्यूज इमेज फीचर उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी, चेहरे की पहचान और डेटा सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करता है या नहीं। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि इस तकनीक के जरिए तैयार की गई तस्वीरों का दुरुपयोग रोकने के लिए मेटा ने कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू किए हैं।
तकनीकी जानकारों का मानना है कि भविष्य में एआई आधारित इमेज और वीडियो जनरेशन टूल्स का उपयोग लगातार बढ़ेगा। ऐसे में समय रहते प्रभावी नियम और निगरानी व्यवस्था तैयार करना आवश्यक है, ताकि नई तकनीक का लाभ समाज को मिले और उसके संभावित दुष्प्रभावों पर भी प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।
फिलहाल केंद्र सरकार म्यूज इमेज फीचर की कानूनी और तकनीकी समीक्षा की प्रक्रिया पर काम कर रही है। जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की दिशा तय होगी। यदि फीचर सभी आवश्यक कानूनी मानकों पर खरा उतरता है तो इसके उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं, जबकि किसी भी तरह की खामी मिलने पर आवश्यक नियामक कदम उठाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।