उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ से पहले साधु-संतों से जुड़े विवाद लगातार सामने आ रहे हैं. इसी बीच अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्रपुरी ने फर्जी साधुओं और संदिग्ध लोगों की पहचान के लिए विशेष अभियान चलाने की बात कही है. उन्होंने कहा कि संतों की अपनी परंपरा होती है और केवल अलग-अलग रंगों के वस्त्र पहन लेने से कोई संत नहीं बन जाता. कई लोग साधु का वेश धारण कर घूम रहे हैं, जिनमें कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिए भी हो सकते हैं, इसलिए उनकी जांच जरूरी है.
कालनेमी अभियान चलाकर होगी जांच
महंत रविंद्रपुरी ने कहा कि उज्जैन में कई ऐसे लोग दिखते हैं जो लाल, काले या नीले वस्त्र पहनकर साधु का रूप धारण किए हुए हैं. वे शरीर पर भस्म लगा लेते हैं और मुंडों की माला पहन लेते हैं, लेकिन यह पता लगाना जरूरी है कि वे कहां से आए हैं और किस संस्था से जुड़े हैं. उनके आधार कार्ड और पहचान से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए. उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में भी इसी तरह का अभियान चलाया गया था, जिसमें कई फर्जी बाबा पकड़े गए थे.
सिंहस्थ से पहले बढ़े विवाद
उधर सिंहस्थ से पहले उज्जैन में साधु-संतों के बीच मतभेद भी खुलकर सामने आ रहे हैं. हाल ही में स्थानीय अखाड़ा परिषद में भी दो गुट बन गए हैं. वहीं महामंडलेश्वर स्वामी शांतिस्वरूपानंद के खिलाफ चरित्र हनन की साजिश के आरोपों ने भी माहौल को गरमा दिया है. इन घटनाओं के कारण कई लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने की बात भी सामने आई है.
गृहस्थ संत को महामंडलेश्वर बनाने पर सफाई
गृहस्थ संतों को महामंडलेश्वर बनाए जाने के सवाल पर महंत रविंद्रपुरी ने कहा कि कुछ परिस्थितियों में समझौता करना पड़ता है. उन्होंने बताया कि जहां किसी आश्रम का संचालन हो रहा हो और वहां परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए योग्य शिष्य न मिलें, वहां जिम्मेदारी किसी उपयुक्त व्यक्ति को देनी पड़ती है. इसी कारण मौनी बाबा आश्रम में स्वामी सुमनानंद को महामंडलेश्वर बनाया गया है. उन्होंने कहा कि स्वामी सुमनानंद नियमित रूप से जप, तप और अनुष्ठान करते हैं और अखाड़े की परंपराओं का पालन कर रहे हैं.
भगवान बापू के मामले पर भी बोले
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भगवान बापू को महामंडलेश्वर बनाए जाने के समय उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि वे गृहस्थ हैं. बाद में जब यह बात सामने आई तो उन्होंने शपथ लेकर कहा कि उनका गृहस्थ जीवन से अब कोई संबंध नहीं है. महंत रविंद्रपुरी के अनुसार वे आश्रम का संचालन करते हैं और जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में भी मदद करते हैं, इसलिए कुछ मामलों में समझौता करना पड़ जाता है.
संत बनकर शादी करना उचित नहीं
संत अवधेशपुरी महाराज के विवाह करने के मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि कई लोगों को विवाह के बाद संत बनते देखा गया है, लेकिन संत बनने के बाद विवाह करने का उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है. उनका कहना था कि साधु-संतों को इस तरह का आचरण शोभा नहीं देता.
सनातन के नाम पर चंदा लेना गलत
महंत रविंद्रपुरी ने यह भी कहा कि सनातन धर्म के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उसे अपने परिवार के पालन-पोषण में खर्च करना गलत है. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका बयान ऐसे ही मामलों को ध्यान में रखते हुए दिया गया था. उनके अनुसार भारत की परंपरा में ऋषि संस्कृति रही है, जहां ऋषियों की पत्नियों को गुरुमाता के रूप में सम्मान दिया जाता है, इसलिए धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की गलत गतिविधि स्वीकार नहीं की जा सकती.